Wednesday, April 8, 2026

भारत में महिलाओं के सशक्तीकरण में शिक्षा की भूमिका



 समग्र शिक्षा योजना के संदर्भ में विश्लेषण

1. परिचय 
महिला सशक्तीकरण का अर्थ केवल आर्थिक स्वतंत्रता या सामाजिक स्थिति में सुधार से नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक अवधारणा है जिसमें महिलाओं को निर्णय लेने की शक्ति, संसाधनों तक पहुँच, और आत्मनिर्भरता प्राप्त करना शामिल है। शिक्षा इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण साधन है, क्योंकि यह महिलाओं को जागरूकता, आत्मविश्वास और कौशल प्रदान करती है जो उनके व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को सशक्त बनाती है ।
भारत में महिला शिक्षा की वर्तमान स्थिति को देखें तो वर्ष 2025 के अनुमानित आँकड़ों के अनुसार महिला साक्षरता दर 71.8 प्रतिशत है, जबकि पुरुष साक्षरता दर 84.4 प्रतिशत है । यह अंतराल यह दर्शाता है कि महिला शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी काफी प्रगति की आवश्यकता है। शिक्षा न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाती है, बल्कि उन्हें स्वास्थ्य, परिवार नियोजन और वित्तीय मामलों में सूचित निर्णय लेने में भी सक्षम बनाती है ।
शिक्षा के माध्यम से महिलाओं का सशक्तीकरण समाज के समग्र विकास में योगदान करता है। शिक्षित महिलाएँ न केवल अपने परिवार की आय में वृद्धि करती हैं, बल्कि समुदाय के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे उद्यमिता और नेतृत्व के क्षेत्रों में आगे आकर सामाजिक परिवर्तन की वाहक बनती हैं । यही कारण है कि भारत सरकार ने महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए समग्र शिक्षा योजना (Samagra Shiksha Abhiyan) जैसी महत्वपूर्ण पहल की शुरुआत की है।
2. समग्र शिक्षा योजना एवं महिला शिक्षा की स्थिति
समग्र शिक्षा योजना: उद्देश्य और विशेषताएँ
• समग्र शिक्षा योजना एक एकीकृत कार्यक्रम है जो पूर्व-प्राथमिक से लेकर कक्षा 12 तक की स्कूली शिक्षा को समग्र रूप से शामिल करता है। यह योजना पूर्व की तीन योजनाओं—सर्व शिक्षा अभियान (SSA), राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (RMSA) और शिक्षक शिक्षा (TE)—को समाहित करती है ।
• योजना का मुख्य उद्देश्य सतत विकास लक्ष्य (SDG) 4.1 और 4.5 के अनुरूप समावेशी और समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना है। SDG 4.1 का लक्ष्य सभी लड़कियों और लड़कों को मुफ्त, समान और गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा प्रदान करना है, जबकि SDG 4.5 शिक्षा में लैंगिक असमानता को समाप्त करने और सभी स्तरों पर समान पहुँच सुनिश्चित करने पर केंद्रित है ।
• योजना में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर विशेष जोर दिया गया है, जिसमें "दो टी" - शिक्षक (Teacher) और प्रौद्योगिकी (Technology) - पर ध्यान केंद्रित किया गया है। वित्त पोषण के संदर्भ में, यह केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसमें पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए केंद्र और राज्यों के बीच अनुपात 90:10 है, जबकि अन्य राज्यों के लिए 60:40 है ।
हालाँकि, वित्तीय कार्यान्वयन में गंभीर चुनौतियाँ देखने को मिलती हैं। संसदीय समिति की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में समग्र शिक्षा योजना के तहत बजटीय आवंटन का केवल 54.9 प्रतिशत ही उपयोग किया जा सका है । यह स्थिति योजना के प्रभावी कार्यान्वयन पर गंभीर प्रश्न उठाती है।
महिलाओं की शिक्षा में भागीदारी: वर्तमान स्थिति
• साक्षरता दर
2025 के अनुमान के अनुसार भारत में महिला साक्षरता दर 71.8 प्रतिशत है, जबकि पुरुष साक्षरता दर 84.7 प्रतिशत है । राज्य स्तर पर विश्लेषण करें तो केरल में महिला साक्षरता सबसे अधिक 95.2 प्रतिशत है, जबकि तमिलनाडु में 80.1 प्रतिशत है। वहीं बिहार (63.8 प्रतिशत) और राजस्थान (65.3 प्रतिशत) जैसे राज्य अभी भी पिछड़े हुए हैं ।
• नामांकन और सकल नामांकन अनुपात
प्राथमिक स्तर पर सकल नामांकन अनुपात (GER) लड़कियों के लिए 101.3 प्रतिशत है, जो लड़कों के 102.5 प्रतिशत के लगभग समान है। यह दर्शाता है कि प्राथमिक शिक्षा तक लड़कियों की पहुँच में उल्लेखनीय सुधार हुआ है ।उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिल रहा है। उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात में महिलाएँ (27.9 प्रतिशत) पुरुषों (27.3 प्रतिशत) से आगे निकल गई हैं । यह एक सकारात्मक संकेत है जो दर्शाता है कि उच्च शिक्षा के प्रति महिलाओं का रुझान बढ़ रहा है।
• ड्रॉपआउट दर
यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार, 15-17 वर्ष के किशोरों (उच्च माध्यमिक स्तर) में स्कूल से बाहर होने की दर 21 प्रतिशत है । विशेष रूप से बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में माध्यमिक स्तर पर लड़कियों के ड्रॉपआउट की दर चिंताजनक है ।
• उच्च शिक्षा में भागीदारी
हालाँकि उच्च शिक्षा में महिलाओं का नामांकन पुरुषों से अधिक है, लेकिन नेतृत्व की भूमिकाओं में उनकी भागीदारी बेहद सीमित है। यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में 189 राष्ट्रीय संस्थानों में केवल 5 प्रतिशत महिलाएँ कुलपति या निदेशक के पद पर थीं । व्यापक स्तर पर 1,220 विश्वविद्यालयों के नमूने में महिलाएँ केवल 9 प्रतिशत कुलपति और 11 प्रतिशत रजिस्ट्रार थीं ।
3. प्रभाव, चुनौतियाँ एवं विश्लेषण
समग्र शिक्षा योजना का महिलाओं पर प्रभाव
समग्र शिक्षा योजना का सबसे सकारात्मक प्रभाव प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर लड़कियों के नामांकन में वृद्धि के रूप में देखा गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों के विस्तार और स्कूली बुनियादी ढाँचे (शौचालय, पेयजल आदि) में सुधार से लड़कियों की स्कूल उपस्थिति में वृद्धि हुई है।
राज्य स्तर पर विश्लेषण करें तो हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में महिला साक्षरता दर 80 प्रतिशत से अधिक है, जो दक्षिणी राज्यों के समकक्ष है । झारखंड ने भी बालिका छात्रवृत्ति और स्कूल नामांकन अभियानों के माध्यम से उल्लेखनीय सुधार दिखाया है ।
सामाजिक बदलाव के संदर्भ में, शिक्षा ने महिलाओं की विवाह आयु बढ़ाने, मातृ मृत्यु दर कम करने और परिवार नियोजन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मातृ मृत्यु दर (MMR) 2014-16 के 130 से घटकर 2018-20 में 97 प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों पर आ गई है ।
हालाँकि, शहरी-ग्रामीण अंतर अभी भी बना हुआ है। शहरी क्षेत्रों में महिला साक्षरता दर ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में काफी अधिक है, और उच्च शिक्षा तक पहुँच भी शहरी महिलाओं के लिए अधिक सुलभ है।
प्रमुख चुनौतियाँ
1. ड्रॉपआउट और लैंगिक असमानता
हालाँकि प्राथमिक स्तर पर लैंगिक समानता प्राप्त हुई है, लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर लड़कियों के ड्रॉपआउट की दर चिंताजनक बनी हुई है। शैक्षणिक वर्ष 2023-24 में मध्य और माध्यमिक स्कूल स्तर पर लड़कियों की ड्रॉपआउट दर लड़कों से अधिक रही ।
2. नेतृत्व में महिलाओं की कम भागीदारी
यूनेस्को की रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर 57 प्रतिशत माध्यमिक स्कूल शिक्षक महिलाएँ हैं, लेकिन अधिकांश देशों में महिला प्रधानाध्यापकों का अनुपात महिला शिक्षकों के अनुपात से कम से कम 20 प्रतिशत कम है । भारत में भी प्राथमिक स्तर पर 60 प्रतिशत से अधिक शिक्षक महिलाएँ हैं, लेकिन माध्यमिक और उच्चतर स्तरों पर नेतृत्व की भूमिकाओं में इनकी संख्या तेजी से घटती जाती है ।
3. संसाधनों की कमी और वित्तीय बाधाएँ
शिक्षा के क्षेत्र में सार्वजनिक व्यय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 3.1 प्रतिशत है, जो SDG के 4 प्रतिशत के मानक से कम और NEP 2020 के 6 प्रतिशत के लक्ष्य से बहुत दूर है । वित्तीय बाधाएँ विशेष रूप से लड़कियों की उच्च शिक्षा में बाधक बनती हैं—एक हालिया अध्ययन के अनुसार, माध्यमिक स्कूल के बाद विज्ञान शिक्षा न लेने वाली 59 प्रतिशत लड़कियों ने वित्तीय बाधाओं को प्राथमिक कारण बताया ।
4. सुरक्षा और सामाजिक मानदंड
NCRB के आँकड़ों के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रिपोर्ट की गई संख्या 2020 में 3,71,503 से बढ़कर 2022 में 4,45,256 हो गई । यह स्थिति महिलाओं की शिक्षा और सार्वजनिक स्थानों पर उनकी भागीदारी पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
केस स्टडी: हिमाचल प्रदेश बनाम बिहार
हिमाचल प्रदेश में महिला साक्षरता दर 80 प्रतिशत से अधिक है, और महिला श्रम बल भागीदारी दर 56.2 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है । इसके विपरीत, बिहार में महिला साक्षरता दर 63.8 प्रतिशत है और माध्यमिक स्तर पर लड़कियों के ड्रॉपआउट की दर उच्च बनी हुई है । यह अंतर बताता है कि राज्य-विशिष्ट हस्तक्षेप और स्थानीय प्रशासन की प्रतिबद्धता महिला शिक्षा की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
केस स्टडी: NAVYA पहल
NAVYA (Nurturing Aspirations through Vocational Training for Young Adolescent Girls) पहल, जो जून 2025 में शुरू की गई, महिला सशक्तीकरण के लिए एक नवीन दृष्टिकोण का उदाहरण है। यह 16-18 वर्ष की किशोरियों को AI-आधारित सेवाओं, साइबर सुरक्षा, डिजिटल मार्केटिंग, ड्रोन असेंबली और CCTV इंस्टॉलेशन जैसे उभरते क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान कर रही है । यह पहल न केवल कौशल विकास पर केंद्रित है, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता, वित्तीय साक्षरता, जीवन कौशल और कानूनी जागरूकता (POSH और POCSO) को भी शामिल करती है ।
4. निष्कर्ष एवं सुझाव
योजना का समग्र मूल्यांकन
समग्र शिक्षा योजना ने भारत में महिला शिक्षा के क्षेत्र में निस्संदेह महत्वपूर्ण योगदान दिया है। प्राथमिक स्तर पर लैंगिक समानता प्राप्त करने, स्कूली बुनियादी ढाँचे में सुधार करने और बालिका शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने में यह योजना सफल रही है। उच्च शिक्षा में महिलाओं का नामांकन पुरुषों से अधिक होना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है । हालाँकि, योजना के कार्यान्वयन में गंभीर कमियाँ हैं। केवल 54.9 प्रतिशत धनराशि का उपयोग और राज्यों के साथ समन्वय में कमी योजना के प्रभाव को सीमित कर रही है। शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय GDP का 3.1 प्रतिशत महिला शिक्षा के समग्र विकास के लिए अपर्याप्त है। नेतृत्व में महिलाओं की कम भागीदारी यह दर्शाती है कि केवल नामांकन बढ़ाने से सशक्तीकरण पूरा नहीं होता।
सुझाव
1. वित्तीय संसाधनों में वृद्धि: शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को NEP 2020 के 6 प्रतिशत के लक्ष्य तक बढ़ाया जाना चाहिए। धनराशि का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने के लिए SNA-SPARSH जैसे रियल-टाइम फंड ट्रांसफर प्लेटफॉर्म का सभी राज्यों में विस्तार किया जाना चाहिए ।
2. लड़कियों के ड्रॉपआउट को रोकने के लिए लक्षित हस्तक्षेप: बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में जिला-विशिष्ट हस्तक्षेप योजनाएँ बनाई जानी चाहिए। छात्रवृत्ति, नि:शुल्क परिवहन, और स्कूलों में महिला शिक्षकों की संख्या बढ़ाने से ड्रॉपआउट दर में कमी लाई जा सकती है ।
3. महिलाओं को नेतृत्व की भूमिकाओं में लाना: स्कूल प्रधानाध्यापकों, कॉलेज प्राचार्यों और विश्वविद्यालय कुलपतियों के पदों पर महिलाओं के लिए आरक्षण या लक्ष्य निर्धारित किए जाने चाहिए। यूनेस्को की रिपोर्ट बताती है कि लैंगिक विविधता वाला नेतृत्व बेहतर शैक्षिक परिणामों से जुड़ा है ।
4. व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास का विस्तार: NAVYA पहल की सफलता को देखते हुए , इसे अधिक जिलों और राज्यों में विस्तारित किया जाना चाहिए। किशोरियों को STEM और उभरते क्षेत्रों में प्रशिक्षण देने से उनकी आर्थिक भागीदारी बढ़ेगी।
5. सुरक्षित शैक्षिक वातावरण: सभी स्कूलों और उच्च शिक्षा संस्थानों में यौन उत्पीड़न निवारण समितियों (POSH) का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। सुरक्षित परिवहन व्यवस्था और छात्रावास सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए।
6. राज्य-विशिष्ट रणनीतियाँ: दक्षिणी राज्यों में महिला श्रम बल भागीदारी में गिरावट और उत्तरी राज्यों में शिक्षा में सुधार के मद्देनजर, प्रत्येक राज्य की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप रणनीतियाँ बनाई जानी चाहिए।
7. शिक्षा वित्तपोषण में सुधार: शिक्षा ऋणों के प्रति जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए, विशेषकर महिलाओं के लिए। SWALAKSH जैसी पहल जो महिलाओं को रियायती ब्याज दरों पर शिक्षा ऋण प्रदान करती हैं , को व्यापक स्तर पर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
समग्र शिक्षा योजना ने भारत में महिला शिक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाए हैं, लेकिन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वित्तीय, संरचनात्मक और सामाजिक स्तर पर और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है। शिक्षा के माध्यम से महिला सशक्तीकरण न केवल एक सामाजिक न्याय का प्रश्न है, बल्कि यह देश के सतत और समावेशी विकास की अनिवार्य शर्त भी है।
 Sources:
1. Ministry of Education, Government of India. (2025). Unified District Information System for Education (UDISE+) 2024–25: Provisional report. New Delhi: Department of School Education & Literacy.
2. National Statistical Office. (2025). Periodic Labour Force Survey (PLFS) 2023–24: Annual report. New Delhi: Ministry of Statistics and Programme Implementation.
3. NITI Aayog. (2024). SDG India Index 2023–24: Progress towards sustainable development goals. New Delhi: Government of India.
4. National Crime Records Bureau. (2024). Crime in India 2023: Statistics. New Delhi: Ministry of Home Affairs.
5. Parliament of India, Standing Committee on Education. (2025). Implementation of Samagra Shiksha Abhiyan: Report No. 385. New Delhi: Lok Sabha Secretariat.

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