कभी भारत को दुनिया ‘बैक ऑफिस’ की नज़र से देखती थी। यहाँ के इंजीनियर दुनिया भर की टेक कंपनियों के लिए कोड लिखते थे, मगर बड़ी तकनीकें दूसरे देशों में बनती थीं। लेकिन पिछले एक दशक में यह तस्वीर बदल गई है। आज भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जिन्होंने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग की है। यहाँ का यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई हर महीने करीब 20 अरब लेनदेन को संभालता है। रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस आसमान में गश्त कर रहा है, और जैव प्रौद्योगिकी में भारत को ‘दुनिया की फार्मेसी’ कहा जाने लगा है। यह बदलाव किसी एक उपलब्धि का नतीजा नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष, सूचना प्रौद्योगिकी, रक्षा और बायोटेक जैसे क्षेत्रों में वर्षों की सोची-समझी रणनीति का परिणाम है। आइए, इन चारों क्षेत्रों में भारत की प्रगति को करीब से समझते हैं।
अंतरिक्ष: जहाँ इसरो ने कम लागत को ताकत बनाया
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो ने हाल के वर्षों में ऐसे मिशन सफलतापूर्वक पूरे किए हैं, जिन्हें दुनिया ने सराहा है। 2023 में चंद्रयान-3 की सफलता ने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला पहला देश बना दिया। उसी साल आदित्य-एल1 सूर्य के अध्ययन के लिए अंतरिक्ष में भेजा गया। इसरो की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इन मिशनों ने न सिर्फ भारत की तकनीकी क्षमता को साबित किया, बल्कि यह भी दिखाया कि उच्च गुणवत्ता वाले अंतरिक्ष मिशन को अपेक्षाकृत कम लागत में कैसे पूरा किया जा सकता है। इन मिशनों का असर सिर्फ अंतरिक्ष तक सीमित नहीं है। इसरो ने स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली नाविक (NavIC) विकसित की है, जो अब सीमा सुरक्षा बलों के लिए सीमा क्षेत्रों में गश्त और निगरानी का अहम हिस्सा बन गई है। इसके अलावा, भारतीय उपग्रहों से मिलने वाले आंकड़े मौसम पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन में काम आ रहे हैं। बंगाल की खाड़ी में आने वाले चक्रवातों की सटीक भविष्यवाणी से लाखों लोगों को समय पर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया जाता है। यह अंतरिक्ष तकनीक का सीधा और जीवनरक्षक अनुप्रयोग है।
सूचना प्रौद्योगिकी: यूपीआई से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक
अगर किसी क्षेत्र ने भारत की तकनीकी छवि को सबसे ज्यादा बदला है, तो वह है डिजिटल टेक्नोलॉजी। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के भुगतान प्रणाली रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 की पहली छमाही में डिजिटल भुगतान की मात्रा कुल लेनदेन का 99.8 फीसदी थी। यूपीआई अकेले ही 85 फीसदी हिस्सेदारी के साथ इस बदलाव की रीढ़ बना। हर महीने 25 लाख करोड़ रुपये से अधिक का लेनदेन यूपीआई के जरिए हो रहा है। लेकिन यह सिर्थ भुगतान तक सीमित नहीं है। डिजिटल इंडिया अभियान के तहत आधार, डिजीलॉकर और यूमंग जैसे प्लेटफॉर्म ने सरकारी सेवाओं को आम नागरिक के मोबाइल तक पहुँचा दिया है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के जरिए सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं का पैसा सीधे लाभार्थियों के खाते में जाता है, जिससे बिचौलियों की भूमिका खत्म हुई है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने हाल ही में इंडियाएआई मिशन के तहत ‘एआई कोश’ नाम से डेटा रिपॉजिटरी बनाई है, जिसमें 400 से अधिक डेटाबेस शामिल हैं। इसका उद्देश्य देश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के समाधान विकसित करने वाले स्टार्टअप और शोधकर्ताओं को सशक्त बनाना है। यह पहल बताती है कि भारत अब सिर्फ डिजिटल सेवाओं का उपभोक्ता नहीं है, बल्कि अगली पीढ़ी की तकनीकों का निर्माता बनने की ओर बढ़ रहा है।
रक्षा: आत्मनिर्भरता से निर्यात तक का सफर
रक्षा क्षेत्र में भारत की यात्रा आयात पर निर्भरता से शुरू हुई और आज यहाँ के स्वदेशी हथियार विदेशों में अपनी पहचान बना रहे हैं। रक्षा सचिव के हवाले से जारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में भारत का रक्षा निर्यात 23,162 करोड़ रुपये के पार पहुँच गया, जो 2014 की तुलना में करीब 35 गुना अधिक है। इस सफलता की कहानी में तेजस लड़ाकू विमान का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यह 4.5 पीढ़ी का मल्टीरोल फाइटर है, जिसे भारतीय वायुसेना में शामिल किया जा चुका है। इसके अलावा अग्नि-5 अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल और स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत ने भारत की समुद्री क्षमताओं को नई ऊंचाई दी है। रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए 462 कंपनियों को 788 से अधिक औद्योगिक लाइसेंस जारी किए गए हैं। रक्षा तकनीक का एक और महत्वपूर्ण पहलू है इसका सामाजिक और आर्थिक उपयोग। पीएम-सेतु जैसे कार्यक्रमों के तहत 60,000 करोड़ रुपये के परिव्यय से रक्षा क्षेत्र में कुशल मानव संसाधन विकसित किए जा रहे हैं। यह न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करता है, बल्कि युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा करता है।
बायोटेक्नोलॉजी और चिकित्सा विज्ञान: दुनिया की फार्मेसी
जब कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया था, तब भारत ने कोवाक्सीन जैसी स्वदेशी वैक्सीन विकसित करके दिखाया कि वह जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी अग्रणी भूमिका निभा सकता है। भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के अनुसार, जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट के तहत भारतीय आबादी की आनुवंशिक विविधता का मानचित्रण किया जा रहा है। इससे व्यक्तिगत चिकित्सा के द्वार खुलेंगे, यानी मरीज की आनुवंशिक संरचना के अनुसार उसके लिए बेहतर इलाज संभव हो सकेगा। तेलंगाना की नई लाइफ साइंसेज नीति के तहत राज्य ने 25 अरब डॉलर के निवेश का लक्ष्य रखा है। यहाँ भारत बायोटेक जैसी कंपनियाँ पहले से ही दुनिया भर में वैक्सीन और बायोलॉजिक्स की आपूर्ति कर रही हैं। इससे यह साबित होता है कि भारत की जैव प्रौद्योगिकी क्षमता सिर्फ शोध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को सस्ती और सुलभ बनाने में योगदान कर रही है।
वैश्विक तुलना: कहाँ खड़ा है भारत?
जब भारत की तुलना अमेरिका, चीन और यूरोप से की जाती है, तो कई मोर्चों पर भारत अपनी बढ़त बना रहा है। अंतरिक्ष क्षेत्र में इसरो का मॉडल नासा और चीनी अंतरिक्ष एजेंसी से अलग है। भारत ने कम लागत में उच्च सफलता दिखाई है। मंगल मिशन (मॉम) की लागत हॉलीवुड की कुछ फिल्मों के बजट से भी कम थी। डिजिटल भुगतान में यूपीआई का स्केल दुनिया में कहीं नहीं देखने को मिलता। अमेरिका के सिलिकॉन वैली में भी भारतीय मूल के सीईओ का दबदबा है, और भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम अब दुनिया में तीसरे स्थान पर है। हालाँकि, कुछ क्षेत्रों में अभी अंतराल बना हुआ है। सेमीकंडक्टर विनिर्माण में भारत अभी ताइवान और अमेरिका पर निर्भर है। उच्च स्तरीय एआई अनुसंधान में निजी क्षेत्र का निवेश चीन और अमेरिका के मुकाबले बहुत कम है। स्टैनफोर्ड एआई इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक कॉर्पोरेट एआई निवेश में भारत की हिस्सेदारी महज 1 अरब डॉलर है, जबकि अमेरिका में यह 250 अरब डॉलर से अधिक है।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका मानव संसाधन है। दुनिया भर में भारतीय आईटी पेशेवरों की माँग है। फार्मा सेक्टर ने ‘दुनिया की फार्मेसी’ का खिताब हासिल किया है। इसरो का कम लागत वाला स्पेस मॉडल विकासशील देशों के लिए प्रेरणा है।
लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। देश सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का मात्र 0.64 फीसदी ही अनुसंधान और विकास पर खर्च करता है। यह आंकड़ा अमेरिका (3.5 फीसदी) और चीन (2.4 फीसदी) से काफी कम है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इस निवेश में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी सिर्फ 36 फीसदी है, जबकि विकसित देशों में यह 75 फीसदी से अधिक होती है। इसके अलावा, प्रतिभा पलायन और उद्योग-शिक्षा के बीच की खाई भी गंभीर मुद्दे हैं।
भारत सरकार ने हाल ही में अनुसंधान, विकास और नवाचार (आरडीआई) योजना को मंजूरी दी है, जिसमें 1 लाख करोड़ रुपये का परिव्यय है। इस योजना का उद्देश्य सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करना है। यह सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) का एक सशक्त मॉडल है। साथ ही, कर्नाटक, तेलंगाना जैसे राज्यों की नीतियाँ यह दिखा रही हैं कि राज्य स्तर पर भी तकनीकी नवाचार को बढ़ावा दिया जा सकता है।
आने वाले वर्षों में भारत को अगर एआई, स्पेस इकोनॉमी और सेमीकंडक्टर विनिर्माण पर ध्यान केंद्रित करना है, तो उसे शिक्षा और उद्योग के बीच की खाई को पाटना होगा। युवाओं को भविष्य की तकनीकों में प्रशिक्षित करने के लिए कौशल विकास कार्यक्रमों का विस्तार करना होगा।
भारत की तकनीकी यात्रा अब सिर्फ ‘मेक इन इंडिया’ के नारे तक सीमित नहीं है। यह ‘मेक फॉर द वर्ल्ड’ की दिशा में बढ़ रही है। चाहे वह चंद्रयान-3 हो, जिसने चाँद की धरती को छुआ, या यूपीआई हो, जिसने गाँव-गाँव में डिजिटल लेनदेन को आम कर दिया, या तेजस हो, जो आसमान में भारत की ताकत का प्रतीक है—हर उपलब्धि बताती है कि भारत अब तकनीकी दुनिया में सिर्फ अनुसरण नहीं कर रहा, बल्कि नई दिशाएँ भी गढ़ रहा है। चुनौतियाँ बनी हुई हैं, लेकिन नीतियों, निवेश और नवाचार का जो मेल अब दिख रहा है, वह भारत को एक सशक्त तकनीकी महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखता है।
Source
1. ISRO – https://www.isro.gov.in/
(मिशन अपडेट, प्रेस विज्ञप्तियाँ)
2. RBI – https://rbi.org.in/
(भुगतान प्रणाली रिपोर्ट, डेटा)
3. MeitY – https://www.meity.gov.in/
(IndiaAI, डिजिटल इंडिया)
4. DBT – https://dbtindia.gov.in/
(जीनोम इंडिया, बायोटेक योजनाएँ)
No comments:
Post a Comment