भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि की अहम भूमिका है। देश की लगभग 58% जनसंख्या की आजीविका कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे भारतीय कृषि के समक्ष एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं। यह रिपोर्ट वर्ष 2024-25 के नवीनतम आंकड़ों, वैश्विक जलवायु रिपोर्टों और शोध अध्ययनों के आधार पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
1. भारतीय कृषि का वर्तमान स्वरूप: उत्पादन एवं पैटर्न
1.1 समग्र उत्पादन परिदृश्य (2024-25)
केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के तृतीय अग्रिम अनुमान (मई 2025) के अनुसार, वर्ष 2024-25 में भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन 3539.59 लाख मीट्रिक टन (LMT) रहा, जो पिछले वर्ष से 6.5% अधिक है।
प्रमुख फसलों का उत्पादन:
· चावल: 1490.74 LMT (रिकॉर्ड) - पिछले वर्ष से 112.49 LMT अधिक
· गेहूं: 1175.07 LMT (रिकॉर्ड) - पिछले वर्ष से 42.15 LMT अधिक
· मक्का: 422.81 LMT (रिकॉर्ड)
· दलहन: 252.38 LMT
· तिलहन: 426.09 LMT
· मूंगफली: 118.96 LMT (रिकॉर्ड)
· सोयाबीन: 151.80 LMT (रिकॉर्ड)
बागवानी उत्पादन 3690.55 LMT रहा, जिसमें प्याज उत्पादन में 26.88% की शानदार वृद्धि हुई।
1.2 प्रमुख कृषि राज्य
भारत के प्रमुख कृषि राज्य और उनकी विशेषताएँ:
· उत्तर प्रदेश - देश का सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक राज्य। गेहूं, गन्ना, धान और आलू में अग्रणी।
· पंजाब एवं हरियाणा - "भारत का अन्न का कटोरा" कहलाते हैं। गेहूं, धान और सरसों की खेती में विशेषज्ञता।
· मध्य प्रदेश - दलहन (चना, तूर) एवं तिलहन (सोयाबीन) उत्पादन में अग्रणी राज्य।
· पश्चिम बंगाल - धान उत्पादन में अग्रणी राज्यों में शामिल।
· महाराष्ट्र - कपास, तूर दाल, मूंगफली एवं प्याज का प्रमुख उत्पादक।
· राजस्थान - बाजरा, सरसों एवं मूंग का प्रमुख उत्पादक।
· गुजरात - कपास, मूंगफली एवं ईसबगोल का प्रमुख उत्पादक।
· बिहार - धान, मक्का एवं सब्जियों का महत्वपूर्ण उत्पादक।
· तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश - धान, तम्बाकू एवं मिर्च का प्रमुख उत्पादक क्षेत्र।
· कर्नाटक - रागी, कॉफी, रेशम एवं सूरजमुखी का प्रमुख उत्पादक।
1.3 प्रमुख नदी घाटियाँ एवं कृषि
· गंगा-यमुना दोआब (उत्तर प्रदेश, हरियाणा) - गेहूं-धान की गहन खेती का क्षेत्र।
· सतलुज-ब्यास घाटी (पंजाब) - हरित क्रांति का केन्द्र, गहन सिंचाई आधारित कृषि।
· ब्रह्मपुत्र घाटी (असम) - धान, चाय, जूट का प्रमुख क्षेत्र।
· गोदावरी-कृष्णा डेल्टा (आंध्र प्रदेश) - धान का मुख्य उत्पादक क्षेत्र।
· नर्मदा-ताप्ती घाटी (मध्य प्रदेश, गुजरात) - कपास, तिलहन एवं गेहूं का उत्पादन।
· कावेरी डेल्टा (तमिलनाडु) - धान एवं गन्ना उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र।
· महानदी घाटी (छत्तीसगढ़, ओडिशा) - धान का महत्वपूर्ण उत्पादक क्षेत्र।
1.4 मृदा के प्रकार एवं फसलें
· जलोढ़ मृदा - उत्तरी मैदान (पंजाब से पश्चिम बंगाल) में पाई जाती है। प्रमुख फसलें: गेहूं, धान, गन्ना, दलहन।
· काली मृदा (रेगुर) - महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात में पाई जाती है। प्रमुख फसलें: कपास, मूंगफली, ज्वार।
· लाल एवं पीली मृदा - झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा में पाई जाती है। प्रमुख फसलें: धान, मक्का, रागी।
· लैटेराइट मृदा - केरल, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल के पहाड़ी भागों में। प्रमुख फसलें: चाय, कॉफी, नारियल, काजू।
· मरुस्थलीय मृदा - राजस्थान में पाई जाती है। प्रमुख फसलें: बाजरा, ज्वार, मूंग।
1.5 फसली पैटर्न: खरीफ एवं रबी
खरीफ (जून-अक्टूबर) - दक्षिण-पश्चिम मानसून पर आधारित। प्रमुख फसलें:
· धान, मक्का, बाजरा, ज्वार
· मूंगफली, सोयाबीन, तिल
· कपास, तूर दाल, उड़द, मूंग
रबी (अक्टूबर-मार्च) - शीत ऋतु में बोई जाने वाली फसलें। प्रमुख फसलें:
· गेहूं, जौ
· चना, मसूर, मटर
· सरसों, अलसी, सूरजमुखी
वर्ष 2025-26 के रबी सीजन की शुरुआत उत्साहजनक रही है। 9 नवंबर 2025 तक रबी फसलों के तहत कुल क्षेत्रफल 130 लाख हेक्टेयर हो गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि से 27% अधिक है। गेहूं का क्षेत्रफल दोगुना से अधिक हो गया है।
2. जलवायु परिवर्तन: वैश्विक एवं राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
2.1 आईपीसीसी की छठी आकलन रिपोर्ट (IPCC AR6)
जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) की छठी आकलन रिपोर्ट के अनुसार:
· जलवायु परिवर्तन ने वैश्विक फसल उत्पादकता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है।
· वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 22% कृषि, वानिकी और भूमि उपयोग क्षेत्र से उत्सर्जित होता है।
· इस प्रकार, कृषि स्वयं जलवायु परिवर्तन का एक प्रमुख कारक भी है।
2.2 हालिया जलवायु रिपोर्टों के प्रमुख निष्कर्ष
क) गंगा डेल्टा में जलवायु जोखिम अध्ययन (Climate Risk Management, 2025)
यह अध्ययन भारत-बांग्लादेश के गंगा डेल्टा क्षेत्र (पश्चिम बंगाल के सुंदरवन इलाके) में जलवायु जोखिम का आकलन करता है। मुख्य निष्कर्ष:
· भारतीय तटीय क्षेत्रों में बांग्लादेश की तुलना में जोखिम की संभावना अधिक है।
· पश्चिम बंगाल के दो ब्लॉक अति उच्च सुभेद्यता वाले क्षेत्रों में पाए गए।
· भारत में एक ब्लॉक अति उच्च जोखिम वाला पाया गया।
ख) धान उत्पादन विफलता का जोखिम (Environmental Research Letters, अगस्त 2025)
यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन के निष्कर्ष:
· जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में जिला-स्तरीय धान उत्पादन विफलता का जोखिम औसतन 26% बढ़ने का अनुमान है।
· अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान और मानसून के आगमन में देरी प्रमुख जोखिम कारक हैं।
· सिंचाई सुविधाओं का विस्तार इस जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
ग) खाद्य सुरक्षा एवं पोषण पर प्रभाव (FAO-AGRIS, 2025)
शोध लेखों के व्यवस्थित विश्लेषण पर आधारित इस अध्ययन से निम्न निष्कर्ष:
· तापमान में परिवर्तन, अनियमित वर्षा और चरम मौसमी घटनाएं फसलों, पशुधन, कुक्कुट और मत्स्य उत्पादन को बाधित करती हैं।
· इससे खाद्यान्नों की उपलब्धता, पहुंच एवं स्थिरता प्रभावित होती है।
· जलवायु परिवर्तन आजीविका और आय को प्रभावित करके असमानताओं को बढ़ाता है।
3. जलवायु परिवर्तन का भारतीय कृषि पर प्रभाव
3.1 फसल उत्पादकता पर प्रभाव
· धान: बढ़ता तापमान (विशेषकर न्यूनतम तापमान) धान के परागण और दाना निर्माण को प्रभावित करता है। मानसून में देरी या सूखे की स्थिति में धान की पैदावार में भारी गिरावट आती है।
· गेहूं: नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद के अनुसार, आने वाले 30 वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण गेहूं की पैदावार में 4% की गिरावट आने की संभावना है। बढ़ते तापमान में फसल की बढ़वार कम हो जाती है और दाना सिकुड़ जाता है।
· दलहन एवं तिलहन: अनियमित वर्षा और फूल आने के समय अत्यधिक तापमान से दलहन एवं तिलहन फसलों की उत्पादकता गिरती है। मार्च 2025 में हरियाणा में हुई ओलावृष्टि ने सरसों और सूरजमुखी की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया।
3.2 कीट एवं रोगों का प्रकोप
गर्म जलवायु में कई कीट अधिक सक्रिय हो जाते हैं। उदाहरण के लिए:
· फॉल आर्मीवॉर्म का प्रकोप बढ़ा, जिससे मक्का की फसल को नुकसान।
· गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm) का प्रकोप बढ़ा, जिससे कपास की फसल प्रभावित हुई।
3.3 सिंचाई जल संकट
· हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की दर बढ़ी, जिससे गंगा, सतलुज जैसी नदियों का जल प्रवाह अनियमित हो गया है।
· भूजल स्तर में गिरावट एक गंभीर समस्या बन गई है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है।
· शोध बताते हैं कि सिंचाई तक पहुंच बढ़ाने से धान उत्पादन विफलता के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
3.4 मुद्रास्फीति एवं आर्थिक प्रभाव
अनियमित मौसम के कारण सब्जियों (विशेषकर प्याज, टमाटर, आलू) के दामों में भारी उतार-चढ़ाव आता है। मई 2025 में महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश में अनियमित बारिश के कारण टमाटर के दाम दोगुने हो गए और प्याज के दामों में भी वृद्धि हुई। यह खाद्य मुद्रास्फीति को बढ़ावा देता है।
3.5 किसानों की आय पर प्रभाव
अनिश्चित मौसम और फसल नष्ट होने से किसानों की आय अस्थिर हो जाती है। केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत किसानों को सुरक्षा प्रदान की है। इस योजना के तहत अब तक 35,000 करोड़ रुपये के प्रीमियम संग्रह के सापेक्ष 1.83 लाख करोड़ रुपये का दावा सीधे किसानों के खातों में भेजा गया है।
4. सरकारी पहलें एवं अनुकूलन रणनीतियाँ
भारत सरकार ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और कृषि को सुरक्षित बनाने के लिए अनेक कदम उठाए हैं:
4.1 फसल बीमा एवं सुरक्षा
· प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) - दावा भुगतान में देरी पर किसानों को 12% ब्याज देने का प्रावधान।
· YESTECH के माध्यम से उपग्रह आधारित फसल नुकसान का आकलन, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी।
4.2 सिंचाई एवं जल संरक्षण
· प्रति बूंद अधिक फसल योजना - ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली को सब्सिडी।
· प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) - सिंचाई क्षमता बढ़ाने पर जोर।
4.3 जलवायु अनुकूल कृषि
· प्राकृतिक खेती और जैविक खेती को बढ़ावा।
· फसल विविधीकरण - फल, सब्जी, औषधीय पौधों, वानिकी, मत्स्य पालन और पशुपालन को प्रोत्साहन।
· कृषि विज्ञान केन्द्रों (KVKs) के माध्यम से किसानों को जलवायु अनुकूल बीज और तकनीक का प्रशिक्षण।
4.4 मूल्य सहायता एवं बाजार
· न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) - पिछले 10 वर्षों में अधिकांश फसलों का MSP दोगुना किया गया।
· PM-AASHA योजना - दलहन एवं तिलहन फसलों (तूर, मसूर, उड़द) की 100% MSP पर खरीद सुनिश्चित की गई।
5. भविष्य की दृष्टि
जलवायु परिवर्तन भारतीय कृषि के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। यद्यपि वर्ष 2024-25 में अनुकूल मानसून एवं सरकारी नीतियों के कारण खाद्यान्न उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है, किंतु भविष्य में बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और चरम मौसमी घटनाओं के कारण फसल उत्पादन पर खतरा बना हुआ है।
प्राथमिकता वाले क्षेत्र:
1. जलवायु अनुकूल फसलों का विकास - सूखा, बाढ़ एवं अधिक तापमान सहन करने वाली किस्मों का अनुसंधान।
2. सिंचाई अवसंरचना का विस्तार - विशेषकर पूर्वी भारत एवं सूखाग्रस्त क्षेत्रों में।
3. जल प्रबंधन - भूजल पुनर्भरण पर जोर, ड्रिप/स्प्रिंकलर सिंचाई को प्रोत्साहन।
4. फसल विविधीकरण - धान-गेहूं के एकाधिकार को कम करके अन्य फसलों की खेती।
5. जागरूकता एवं क्षमता निर्माण - किसानों को मौसम पूर्वानुमान, बीमा एवं जलवायु अनुकूल तकनीकों के प्रति प्रशिक्षण।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सरकारी प्रयासों के साथ-साथ किसानों, शोध संस्थानों और नागरिक समाज के सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन को कृषि नीति का केन्द्रबिंदु बनाना आज की आवश्यकता है, ताकि भारत की खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय को सतत रूप से संरक्षित किया जा सके।
संदर्भ स्रोत
1. PIB (Press Information Bureau), Government of India, 29 July 2025
2. PIB, Government of India, 28 May 2025
3. PIB, Government of India, 25 November 2025
4. IPCC Sixth Assessment Report (2025)
5. Environmental Research Letters, Volume 20, 2025
6. Climate Risk Management, Volume 47, 2025 (Elsevier)
7. FAO-AGRIS Systematic Review, 2025
8. Indian Rice Exporters Federation (IREF) Report, November 2025
9. The Hindu Business Line, November 2025
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