भारत, दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश, अपनी स्वास्थ्य अवसंरचना को लेकर एक विषम परिदृश्य प्रस्तुत करता है। जहाँ एक ओर विश्व स्तरीय निजी अस्पताल मेडिकल टूरिज्म के केंद्र बन गए हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) तक पहुँच एक चुनौती बनी हुई है। COVID-19 महामारी ने इस अवसंरचना की मजबूतियों और कमजोरियों दोनों को उजागर किया। यह रिपोर्ट शहरी-ग्रामीण असमानताओं, सरकारी-निजी क्षेत्र की भूमिका, प्रमुख सरकारी पहलों और भविष्य के सुधार हेतु सुझावों का गहराई से विश्लेषण करती है।
वर्तमान स्थिति: संख्याओं का परिदृश्य
भारत का स्वास्थ्य अवसंरचना तंत्र तीन-स्तरीय (प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक) ढांचे पर आधारित है।
· अस्पताल और बेड: नेशनल हेल्थ प्रोफाइल (NHP) 2022 (सबसे हालिया व्यापक डेटा) के अनुसार, देश में कुल 1,69,000 से अधिक सरकारी स्वास्थ्य संस्थान हैं। हालाँकि, बेड की उपलब्धता केवल लगभग 1.9 मिलियन (सरकारी और निजी मिलाकर) है। प्रति 1,000 जनसंख्या पर बेड का अनुपात लगभग 1.4 है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा सुझाए गए 3.5 बेड प्रति 1,000 जनसंख्या के मानक से काफी कम है।
· डॉक्टर-पेशेंट अनुपात: मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) और NITI आयोग के आंकड़ों के अनुसार, देश में लगभग 13-14 लाख एलोपैथिक डॉक्टर पंजीकृत हैं। WHO का मानक 1:1000 (प्रति 1,000 जनसंख्या पर 1 डॉक्टर) है। भारत में यह अनुपात लगभग 1:834 (जनसंख्या 140 करोड़ के हिसाब से) है, जो संख्यात्मक रूप से राष्ट्रीय औसत पर तो पूरा होता दिखता है, लेकिन यह वितरण असमानता को छुपाता है।
· मानव संसाधन: भारी असमानता नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ में भी है। सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में लगभग 30-40% पद खाली पड़े हैं, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
ग्रामीण बनाम शहरी स्वास्थ्य सेवाओं का अंतर
यह अंतर भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली की सबसे बड़ी विफलता है।
· उपलब्धता: शहरी क्षेत्रों में देश के 66% अस्पताल हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 66% से अधिक जनसंख्या निवास करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में उप-स्वास्थ्य केंद्र (Sub-Centers) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHCs) अक्सर बुनियादी सुविधाओं (बिजली, पानी, दवाइयों) के अभाव में काम करते हैं।
· पहुँच (Accessibility): ग्रामीण भारत में एक बड़ा वर्ग उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 50-100 किमी की यात्रा करने को मजबूर है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) की रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 20% आबादी ही सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग गंभीर बीमारियों के लिए करती है; शेष निजी क्षेत्र या बाहर जाते हैं।
· गुणवत्ता: शहरी निजी अस्पताल उच्च तकनीक (MRI, CT-Scan, Robotic Surgery) से सुसज्जित हैं, जबकि ग्रामीण सरकारी अस्पतालों में बुनियादी डायग्नोस्टिक सुविधाओं का भी अभाव है। इस असमानता के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में आउट-ऑफ-पॉकेट (OOP) स्वास्थ्य व्यय अधिक होता है, जो गरीबी का एक प्रमुख कारण है।
सरकारी योजनाएँ और पहलें
हाल के वर्षों में सरकार ने इन अंतरालों को पाटने के लिए कई महत्वाकांक्षी योजनाएँ शुरू की हैं:
· आयुष्मान भारत (PM-JAY): 2018 में शुरू किया गया यह विश्व का सबसे बड़ा सरकारी स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम है। यह 10.74 करोड़ गरीब परिवारों (लगभग 50 करोड़ लाभार्थी) को प्रति वर्ष 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य कवर प्रदान करता है। इसने द्वितीयक और तृतीयक देखभाल तक पहुँच को वित्तीय रूप से सुरक्षित बनाया है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में निजी अस्पतालों के मिलीभगत और दावों के निपटान में देरी जैसी चुनौतियाँ हैं।
· आयुष्मान आरोग्य मंदिर (हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर - HWCs): सरकारी प्राथमिक देखभाल को मजबूत करने के लिए 1.5 लाख से अधिक HWCs स्थापित किए जा रहे हैं। ये केंद्र प्राथमिक देखभाल को व्यापक बनाते हुए गैर-संचारी रोगों (NCDs) जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप की जांच और मुफ्त दवाएँ प्रदान कर रहे हैं।
· आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM): यह डिजिटल स्वास्थ्य पहल प्रत्येक नागरिक को एक यूनिक हेल्थ आईडी (ABHA ID) प्रदान करती है। इसका उद्देश्य डिजिटल रिकॉर्ड के माध्यम से डॉक्टरों, अस्पतालों और रोगियों के बीच अंतरसंचालनीयता (interoperability) सुनिश्चित करना है।
निजी क्षेत्र की भूमिका और बढ़ती निर्भरता
भारत में निजी क्षेत्र स्वास्थ्य सेवा का प्रमुख स्तंभ बन चुका है।
· हिस्सेदारी: NSSO (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय) के आंकड़ों के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में 70% से अधिक और ग्रामीण क्षेत्रों में 60% से अधिक ओपीडी (OPD) और आईपीडी (IPD) सेवाएँ निजी क्षेत्र द्वारा प्रदान की जाती हैं।
· प्रभाव: निजी क्षेत्र ने दक्षता, नवाचार और उपलब्धता तो बढ़ाई है, लेकिन इसने स्वास्थ्य सेवा को एक वस्तु (commodity) में बदल दिया है। इसकी वजह से भारत में आउट-ऑफ-पॉकेट (OOP) व्यय कुल स्वास्थ्य व्यय का लगभग 50-60% है, जो दुनिया में सबसे अधिक है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इलाज के लिए संपत्ति बेचने को मजबूर हो जाते हैं।
COVID-19 महामारी के बाद आए बदलाव
महामारी ने भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली को एक 'स्ट्रेस टेस्ट' से गुजारा।
1. आक्सीजन और आईसीयू (ICU) बेड में वृद्धि: दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की भारी कमी के बाद, सरकार ने राष्ट्रीय ऑक्सीजन आपूर्ति ढांचे को मजबूत किया। पीएसए (Pressure Swing Adsorption) ऑक्सीजन संयंत्रों की संख्या देशभर के जिला अस्पतालों में तेजी से बढ़ाई गई।
2. टेली-मेडिसिन (e-Sanjeevani): महामारी ने डिजिटल स्वास्थ्य को बढ़ावा दिया। ई-संजीवनी प्लेटफॉर्म ने अब तक 20 करोड़ से अधिक टेली-कंसल्टेशन किए हैं, जिससे ग्रामीण मरीजों को विशेषज्ञ डॉक्टरों से दूरस्थ संपर्क स्थापित करने में मदद मिली है।
3. पब्लिक हेल्थ फंडिंग में वृद्धि: महामारी ने सरकारी स्वास्थ्य व्यय की आवश्यकता को रेखांकित किया। हालाँकि, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 1.2-1.5% स्वास्थ्य पर सरकारी व्यय अभी भी अपर्याप्त है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP) 2017 का लक्ष्य इसे 2.5% तक ले जाने का है, जो अब तक अधूरा है।
प्रमुख चुनौतियाँ
· फंडिंग (Funding): भारत में सरकारी स्वास्थ्य व्यय GDP का मात्र 1.28% (Economic Survey 2023-24) है। यह चीन (लगभग 3%), ब्राजील (लगभग 4%) और अमेरिका (16%) जैसे देशों की तुलना में बहुत कम है।
· मानव संसाधन की कमी (HR Crisis): भारत में विशेषज्ञ डॉक्टरों (Surgeons, Gynecologists, Pediatricians) की भारी कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों में 80% से अधिक सर्जन शहरी क्षेत्रों में केंद्रित हैं।
· क्षेत्रीय असमानता: बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों का स्वास्थ्य संकेतक (IMR, MMR) केरल, तमिलनाडु या महाराष्ट्र से बहुत पीछे हैं। स्वास्थ्य अवसंरचना का विकेन्द्रीकरण असमान रूप से हुआ है।
· इंफ्रास्ट्रक्चर गैप: राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन (NUHM) के तहत शहरी गरीबों (slum dwellers) के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ अभी भी अपर्याप्त हैं।
अंतरराष्ट्रीय मानकों के संदर्भ में भारत की स्थिति
• संकेतक भारत (वर्तमान) अंतरराष्ट्रीय मानक (WHO / वैश्विक औसत)
• प्रति 1000 जनसंख्या पर बेड ~1.4 3.5 (WHO अनुशंसित) / वैश्विक औसत ~2.7
• प्रति 1000 जनसंख्या पर डॉक्टर ~1.2 1.5 (वैश्विक औसत)
• सरकारी स्वास्थ्य व्यय (% GDP) ~1.28% 5-6% (OECD देशों का औसत)
• आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय (OOP) 50-60% 32% (वैश्विक औसत), <15% (यूरोप)
भारत की स्थिति यह दर्शाती है कि मात्रात्मक रूप से (जैसे डॉक्टरों की संख्या) हम मानकों के करीब हैं, लेकिन गुणात्मक रूप से (quality) और वितरण (distribution) के मामले में हम अंतरराष्ट्रीय मानकों से काफी नीचे हैं।
भविष्य की संभावनाएँ और सुधार के सुझाव
भविष्य की संभावनाएँ:
डिजिटल हेल्थ (ABDM), मेडिकल एजुकेशन में विस्तार (नए AIIMS और मेडिकल कॉलेज), और फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरिंग में भारत की मजबूती भविष्य में आशा की किरण हैं। 'हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर' को अब 'इकोनॉमिक ग्रोथ इंजन' के रूप में देखा जा रहा है।
सुधार के ठोस सुझाव:
1. सार्वजनिक वित्त पोषण में वृद्धि: स्वास्थ्य पर GDP का 2.5% तक व्यय अनिवार्य किया जाना चाहिए। यह व्यय केवल केंद्रीय बजट तक सीमित न रहे; राज्यों को भी अपने बजट में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
2. ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल: दूरदराज के क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की दक्षता का लाभ उठाने के लिए नियमन के साथ PPP मॉडल को मजबूत किया जाए, ताकि वहाँ डायलिसिस, कैंसर केयर जैसी सुविधाएँ विकसित की जा सकें।
3. मानव संसाधन रणनीति: ग्रामीण क्षेत्रों में पोस्टिंग के लिए डॉक्टरों को विशेष वेतनमान, आवास और करियर प्रगति के अवसर दिए जाएँ। नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ की शिक्षा को बढ़ावा देकर उनकी संख्या में वृद्धि की जाए।
4. निजी क्षेत्र का विनियमन (Regulation): निजी अस्पतालों में पारदर्शिता लाने के लिए सभी दरें (CPT) सरकार द्वारा निर्धारित की जाएँ। क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट (CEA) का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।
5. प्राथमिक देखभाल को मजबूती: आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (HWCs) को पूरी तरह सक्रिय करते हुए उनमें डायग्नोस्टिक लैब और टेली-मेडिसिन की सुविधा को अनिवार्य किया जाए। रोगी को उच्च स्तर के अस्पताल में रेफर करने से पहले प्राथमिक स्तर पर ही 80% समस्याओं का समाधान किया जाए।
भारत की स्वास्थ्य अवसंरचना एक 'दोहरी अर्थव्यवस्था' का रूप ले चुकी है। जहाँ निजी क्षेत्र ने तृतीयक देखभाल में विश्व स्तरीय सुविधाएँ दे दी हैं, वहीं सरकारी क्षेत्र, विशेषकर ग्रामीण भारत में, अभी भी बुनियादी ढांचे और जनशक्ति के अभाव से जूझ रहा है। आयुष्मान भारत और डिजिटल हेल्थ मिशन जैसी योजनाएँ सही दिशा में उठाए गए कदम हैं, लेकिन उनकी सफलता तभी संभव है जब इनके साथ वित्तीय निवेश और मानव संसाधन विकास की गति तेज की जाए। महामारी ने स्पष्ट कर दिया कि स्वास्थ्य अवसंरचना सिर्फ एक सामाजिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का आधार है। सरकार को निजी क्षेत्र की भूमिका को स्वीकारते हुए, एक मजबूत, सुलभ और समान सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का निर्माण करना होगा, ताकि "स्वास्थ्य" वास्तव में सभी के लिए सुलभ हो सके।
संदर्भ (References):
1. National Health Profile (NHP) 2022, Ministry of Health and Family Welfare.
2. National Family Health Survey (NFHS-5), 2019-21.
3. Economic Survey 2023-24, Ministry of Finance, Government of India.
4. NITI Aayog Reports on Health (Health Index Reports).
5. World Health Organization (WHO) - Global Health Observatory data.
6. Ayushman Bharat Digital Mission (ABDM) Dashboard.
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